Sunday, 25 March 2018

हे पद्मावती इन्हें क्षमा करना!


मैं सेटेनिक वर्सेस भी पढ़ना चाहता हूं। पद्मावती भी देखना चाहता हूं।
मैं एक ऐसे लोकतंत्र में रहता हूं, जो धर्म से निरपेक्ष घोषित है। मैं चाहता हूं कि एक लेखक या फिल्मकार की रचना पढ़े और देखे जाने के बाद ही तय हो कि वह कैसी है? अगर कुछ गलत है तो किताब खुद ब खुद रद्दी की टोकरी में चली जाएगी और फिल्म भी फ्लाप हो जाएगी। जनभावनाओं के नाम पर जितना सेटेनिक वर्सेस पर बंदिश अलोकतांत्रिक है और लगत है, उतना ही किसी भी मूवी की ऐसी मुखालिफत। दोनों ही गलत हैं। जबकि मूवी को कुछ दानिशमंद देख चुके हैं और बता चुके हैं कि उसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो राजपूतों की भावनाओं को आहत करने वाला हो। उसमें अलाउद्दीन खिलजी का महिमा गान नहीं है। पद्मिनी से उसके किसी काल्पनिक प्रेम प्रसंग का दृश्य नहीं है। फिर इस स्तर पर ऐसा विरोध समझ के परे है।
यह किसी राजपूत को तो कतई शोभा नहीं देता। राजपूतों की पुरातन पहचान ऐसी नहीं है। आमतौर पर वे शौर्य के प्रतीक रहे हैं। राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप की छवियां अन्याय और अनीति के विरुद्ध अपना सब कुछ दाव पर लगाकर दुश्मन को ललकारने वाले वीर योद्धाओं की रही है। वे राजपूत समाज के ही महानायक नहीं हैं। वे सदियां बीतने के बाद भी आम भारतीयों के आदर्श बने हुए हैं। लेकिन आज के राजपूतों संगठनों और सेनाओं का सलूक देखिए। वे भेड़चाल में फंसे हुए हैं। ऐसा लगता है कि बुद्धि का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें अपनी संगठन शक्ति, समय और ऊर्जा का इस्तेमाल ज्यादा रचनात्मक चीजों में करना चाहिए। भारत की दूसरी जरूरी समस्याओं में खुद को खपाना चाहिए।
फिल्म के ऐसे सड़क छाप अंधे विरोध ने यह सिद्ध किया है कि हम एक अराजक समाज में तब्दील हो रहे हैं, जहां चंद गुंडे किसी भी संगठन के नाम की आड़ में पूरी कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में ले सकते हैं। वे सरकारों को अपने मनमाफिक झुका सकते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण तो कतई नहीं है। सरकारों को भीड़ के आगे झुकने की बजाए सच के पक्ष में मजबूत होना और उससे ज्यादा मजबूत दिखना चाहिए। जिन राज्यों में फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने के त्वरित फैसले ले लिए गए, वहां शीर्ष और समझदार राजनीतिक नेतृत्व को राजपूत समाज के बुद्धिमान लोगों को इस बात के लिए राजी करना चाहिए था कि वे फिल्म को देखकर ही कोई राय जाहिर करें। बिना देखे अराजकता न फैलाएं। यह सरकारों की प्रतिष्ठा को भी खराब करने वाला अनुभव रहा।
एक फिल्म के विरोध का यह तरीका भारतीय तो कतई नहीं है। हमारे यहां वात्सायन ने कामसूत्र रचे मगर किसी ने उनकी कृति नहीं जलाई। उनका गला नहीं काटा। उलटा उन्हें भी आदर से मुनि माना। चार्वाक का दर्शन नितांत भोगवादी है। मगर किसी मुनि-महर्षि ने पागलों की तरह फतवे नहीं फैंके। चार्वाक को भारतीय मनीषा ने एक ऋषि की तरह स्वीकार किया। रैदास ने जूते बनाते हुए परमात्मा के गीत गाए। किसी ने उनकी हत्या की सुपारी किसी को नहीं दी। यह हमारे स्वभाव में निहित रही सहिष्णुता के सहज उदाहरण हैं। एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश में फिल्म के विरोध का ऐसा आचरण पूरी सभ्यता को कटघरे में रखने के लिए तैयार और निराश नकली बुद्धिजीवियों को अच्छी खुराक दे रहा है।
कई साल पहले मेरी मुलाकात जानी-मानी पत्रकार नलिनीसिंह से हुई थी। उस समय अरुण शौरी की किसी किताब का विरोध आंबेडकर के अनुयायी कर रहे थे। कहीं वह किताब जलाई गई थी। नलिनीसिंह का कहना था कि विरोध का यह तरीका मूर्खतापूर्ण है। अगर किताब पर विरोध है तो आंबेडकरवादियों को ऐसी ही एक किताब लिखकर अपनी बात कहनी चाहिए।
हे पद्मावती, हे सांगा, हे महाराणा बलहीन हो चुके इन बुद्धिहीनों को क्षमा करना। ये नहीं जानते कि ये आपके नाम पर क्या-क्या कर रहे हैं?
25 जनवरी 2018
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