Thursday, 20 November 2014

दो अकेले इंसान


यह राहुल गांधी के नाम देश के एक नागरिक का पत्र है। इसका शीर्षक देना उचित समझा-दो अकेले इंसान। बहरहाल पत्र शुरू करता हूं-
आदरणीय राहुलजी, हर कोई युवा अपना कॅरिअर बहुत समझदारी से चुनता है। वह ऐसा क्षेत्र चुनता है, जिसमें वह सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन कर सके या सबसे ज्यादा कमाई कर सके या दोनों। वह कोई जोखिम नहीं लेता। हम मानते हैं कि आपने अपने लिए कॅरिअर का चुनाव सौ टंच जांच-परखने के बाद ही किया होगा।

यह किसने कहा है कि एक बड़े ताकतवर राजनीतिक घराने के उत्तराधिकारी होने से आप सत्ता में रहकर ही जनता से जुड़े माने जाएंगे।  आप एक कारोबारी होकर भी जनता से जुड़े मुददों में अपने सुर मिलाए रख सकते थे। हम आपको अपनी कंपनी या कारखाना चलाते हुए भी अपना रोल मॉडल बनाते। आप एक पायलट होते तो शायद देश के ज्यादा लाड़ले होते। आप कुछ गा रहे होते, फोटोग्राफी कर रहे होते या पेंटिंग बना रहे होते, कुछ लिख ही रहे होते तो देश के दिल में जगह पाते। आपकी अपनी काबिलियत के लिए आपका डंका बजता। वह आपकी अपनी हैसियत होती।
मगर आपको यह मंजूर नहीं था। आपने राजमार्ग चुन लिया। शायद आसान समझकर। आपके बुद्धिशाली सलाहकारों ने आपको क्यों यह नहीं बताया गया कि यहां दूसरों के निशान पर चलकर कोई टिकता भी नहीं है। महान बनना तो भूल ही जाइए। आपको लगा कि पूर्वजों के बड़े कदों की दूर तक फैली छाया में अत्यंत आरामदेह अंदाज में चलते हुए ही आप अपनी उम्र गुजार लेंगे। जयजयकार सुनते से ही फुरसत नहीं मिलेगी। विकास और नेतृत्व किस चिड़िया का नाम है? आप मात खा गए। कंबख्त कांग्रेसियों की यह मजाल कि वे यह कहने की जुर्रत करें कि आप जोकर हैं। आप सर्कस कंपनी के मुखिया हैं। जहां आप जाते हैं, वोट कटने की गारंटी योजना वहां लागू है। एक मां कैसे अपने बेटे की बेइज्जती बर्दाश्त कर सकती है? विपक्ष कुछ कहे, समझ में आता है। मगर अपने ही दो टके के कांग्रेसी। कल तक दरवाजे पर दुम हिलाते थे। अब हमारी बिल्ली हमें ही म्याऊं।
जो पत्रकार आपसे मिले हैं या आपको नजदीक से जानते हैं, उनमें से कुछ से मेरी बात हुई है। आपके बारे में दो बातें बिल्कुल दावे से कही गई हैं। एक, राहुलजी बेईमान नहीं हैं। हो ही नहीं सकते। दूसरा, उनमें ऊर्जा है। कुछ नया करना चाहते हैं, जिससे भारतीयों की जिंदगी आसान हो। किसी ने आपको कम करके नहीं आंका। आपकी मासूमियत अचरज में डालने वाली थी। बिल्कुल बच्चों जैसी ऊर्जा और भोलापन। भारत की दुर्गम राजनीति में सिर्फ इससे ही अच्छे अंक नहीं मिल सकते। तारीफ से ही काम चलाना होगा।
अब आप सोचिए। आपके पिता अनिच्छा से राजनीति में आए। मजबूरी में। उनके प्रधानमंत्री बनने तक वे सितारा हैसियत के इंसान थे। नेहरू के बाद जनता के दिलों में प्यार से जगह बनाने वाला उन जैसा ही सुंदर इंसान हो सकता था। आपमें बिल्कुल वही संभावना थी। राजनीति में वे मजबूरी से आए तो भी प्रधानमंत्री तो बने ही। भारत में राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले हरेक की जिंदगी का सबसे महान सपना। (यह और बात है कि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी वह। यही मजबूरी उनकी दुखद मृत्यु का कारण बनी। आज आपके साथ उन्हें भी देखते तो आनंद ही कुछ और आता। नेहरू के वंशज दिलों में राज करने का हक कायम रखते।)
आपकी क्या मजबूरी थी? साल-दर-साल आपके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं कैलेंडर पर बदलते हर पन्ने के साथ खत्म और हल्की होती गईं। अब तस्वीर एक बिल्कुल डूबे हुए जहाज की है, जिस पर आपको देखकर लोग क्या-कुछ कह रहे हैं। शर्म आती है। आप इस अपमान के अधिकारी नहीं थे। किनकी वजह से आप इस अवस्था को प्राप्त हुए? कभी सोचिए।
तब शायद कुछ चेहरे आपको याद आएंगे। उन लोगों के, जो पिछले दस-पंद्रह साल आपके सबसे निकट थे। आपके सबसे भरोसेमंद, सबसे प्रतिभाशाली, दूरदर्शी सलाहकारों के चेहरे। जिनके साथ आपकी सुबह होती होगी, जो दोपहर में आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर होते होंगे और जो शाम ढलते ही होने ही चाहिए थे।
आप हमें न बताएं। हमें नहीं पूछना कि वे कौन हैं? उनकी हैसियत क्या है? वे प्राचीन से ज्यादा अजब-गजब इस प्यारे भारत को कितना जानते हैं? भारतीयों से उनका परिचय कितना गहरा है? बेशक वे काफी अनुभवी होंगे। धूप में बाल सफेद और लंबे करके न आए होंगे। और वे तब आपसे कह क्या रहे थे और खुद क्या कर रहे थे? जरा याद कीजिए। उनकी दस बड़ी सलाहों की सूची बनाइए। इन्हें नतीजों से मिलाकर देखिए कि वे किस बीमारी की क्या दवाई बता रहे थे? अब तो सारी रिपोर्टें सामने हैं। महाशय आपसे किस डॉक्टर ने कहा था कि इन अनुभवी ओझाओं के ताबीजों को गले में टांगना है?
मैं महसूस कर सकता हूं कि आपको अब वे ताबीज के काले धागे दम घोंटू साबित हो रहे होंगे। जब अपने जमाने के सामने किसी बिल के टुकड़े-टुकड़े किए थे उन दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहीं विदेश में थे। एक अच्छे भले आदमी की प्रधानमंत्री के रूप में सबसे बड़ी दुर्गति तब हो रही थी, जब वो विदेश की धरती पर था। आज नरेंद्र मोदी को विदेशी धरती पर देख अपने ड्राइंगरूमें टीवी के सामने बैठे मनमोहन सिंह अपनी विदेश यात्राओं की याद ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की किसी मूक फिल्म की तरह करते होंगे। आज किसकी मजाल है कि सरकार या संगठन का कोई भी माई का लाल मोदी के लिखे मामूली कागज के पुर्जे की भी धज्जियां उड़ा दे। राजनीति में विनम्रता की अपनी सीमा है। आखिरकार दमखम दमखम ही है। मगर यही चीज है जो विरासत में नहीं आती। दाव पर लगाने के लिए अपना भी कुछ चाहिए।
 आपके सलाहकारों ने आपके पास कुछ खास नहीं छोड़ा है। एक पल के लिए मान लीजिए अब आप कारोबारी बनते हैं, पायलट होते हैं, फोटोग्राफी करेंगे, गाने में दिलचस्पी लेंगे, वकालत या किसानी करेंगे तो वही इज्जत नहीं होगी, जो पहले होती। अब राजनीति में नाकामी का घाव अश्वत्थामा की तरह तब तक भटकाता रहेगा, जब तक कि पूरे बहुमत से कांग्रेस को लौटा नहीं लाते। 
इस लिहाज से अब आप दोराहे पर हैं। एक तो वही जाना-पहचाना राजमार्ग है, जहां चलते हुए आज आप यहां तक आ गए हैं। जो लक्षण भारत, अमेरिका और आस्ट्रेलिया तक दिखाई देते हैं, उनसे प्रभावित हुए बगैर भी किसी चमत्कार के बगैर लगता नहीं कि अगले पांच साल में आप मोदी की काट कर पाएंगे। आपके बिना भी कांग्रेस में कौन इतना सक्षम आैर प्रबल है, जो एक नपुंसक को वीर्यवान बल प्रदान कर दे।
 साधारण नशा ही जिंदगी बरबाद नहीं करता, राजनीति का नशा और बुरी हालत करता है। भले ही नशा खुद लगा हो या दूसरों ने लगाया हो। वैसे दूसरों की क्या मजाल कि वे मुझे बरबाद कर दें। अपने लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। सिर्फ मैं।
अंत में, राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बारे एक रोचक तथ्य। अलग-अलग कारणों से दोनों में एक बड़ी और शायद एक ही समानता है। 
 दोनों अकेले हैं!

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